दृष्टिवैषम्य - कारण, लक्षण एवं उपचार की संपूर्ण जानकारी।

दृष्टिवैषम्य (एस्टिग्मैटिज़्म – Astigmatism in Hindi)

A woman focusing through glass

रिफ्रेक्टिव इरर (नजर का कमजोर होना) आंखों से संबंधित एक बहुत ही आम समस्या है।

इसमें निकटदृष्टि दोष (मायोपिया), दूरदृष्टिदोष (हायपरोपिया) और एस्टिग्मैटिज़्म (दृष्टिवैषम्य) को सम्मिलित किया जाता है। इन्हें रिफ्रेक्टिव इरर/अपरवर्तक त्रुटि इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इन तीनों ही समस्याओं में यह महत्वपूर्ण होता है कि आपकी आंखें प्रकाश को कैसे रिफ्रेक्ट या अपवर्तित होती हैं।

निकटदृष्टि दोष और दूरदृष्टिदोष के मामले काफी अधिक होते हैं, इसलिए अधिकतर लोगों को इसके बारे में जानकारी होती है, लेकिन एस्टिग्मैटिज़्म के बारे में कम ही लोग जानते हैं।

एस्टिग्मैटिज़्म, जन्मजात होता है या बाद में विकसित हो सकता है।

इसका पूरी तरह उपचार संभव है, इसलिए एस्टिग्मैटिज़्म के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं, थोड़ी सी भी लापरवाही आपको भैंगा बना सकती है।

जानिए क्या होता है एस्टिग्मैटिज़्म?

एस्टिग्मैटिज़्म, आंखों से संबंधित एक समस्या है, जो कोर्निया (जो आंखों की सबसे बाहरी सतह होती है) की आकृति में गड़बड़ी होने से होती है।

जिन्हें एस्टिग्मैटिज़्म होता है, उनका लेंस या कोर्निया का कर्व या घुमाव अनियमित हो जाता है, जिससे आंख से प्रकाश के गुजरने या रिफ्रेक्ट होने का तरीका बदल जाता है। इससे दृष्टि धुंधली, अस्पष्ट या विकृत हो जाती है।

आंखों की सामान्य बनावट में थोड़ा सा कर्व या घुमाव तो होता ही है, लेकिन जब यह आसामान्य हो जाए तो आंखों की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।

एस्टिग्मैटिज़्म को चश्मे, कांटेक्ट लेंस या सर्जरी के द्वारा आसानी से ठीक किया जा सकता है।

प्रकार

एस्टिग्मैटिज़्म का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जा सकता है।

आंखों की संरचना में विकृति के आधार पर

आंखों की संरचना में विकृति के आधार पर एस्टिग्मैटिज़्म दो प्रकार का होता है;

1. कोर्नियल एस्टिग्मैटिज़्म

कोर्नियल एस्टिग्मैटिज़्म तब होता है, जब कोर्निया की आकृति/घुमाव खराब हो जाती है।

2. लेंटीक्युलर एस्टिग्मैटिज़्म

लेंटीक्युलर एस्टिग्मैटिज़्म तब होता है जब लेंस की आकृति में खराबी आ जाती है।

रिफ्रेक्टिव इरर के आधार पर

यह बहुत सामान्य है कि निकटदृष्टि दोष (मायोपिया) या दूरदृष्टिदोष (हाइपरओपिया) के साथ एस्टिग्मैटिज़्म भी हो। इसके आधार पर एस्टिग्मैटिज्म का वर्गीकरण तीन तरह से किया जाता है

1. मायोपिक एस्टिग्मैटिज़्म

यह तब होता है जब एस्टिग्मैटिज़्म निकट दृष्टि दोष के साथ होता है और कोर्निया के दोनों घुमावों (कर्व्स) के फोकस, रेटिना के सामने केंद्रित होते हैं।

2. हाइपरओपिक एस्टिग्मैटिज़्म

जब दूर-दृष्टिदोष और एस्टिग्मैटिज़्म साथ-साथ होते हैं और कोर्निया के दोनों घुमावों (कर्व्स) के फोकस, रेटिना के पीछे केंद्रित होते हैं, तो इसे हाइपरओपिक एस्टिग्मैटिज़्म कहते हैं।

3. मिक्स्ड एस्टिग्मैटिज़्म

मिक्स्ड एस्टिग्मैटिज़्म में दोनों घुमाव अलग-अलग कारणों से होते हैं; एक घुमाव दूरदृष्टि दोष के कारण होता है और दूसरा निकट दृष्टिदोष के काऱण।

वक्रों/कर्व्स (घुमावों) की स्थिति के आधार पर

1. रेग्युलर एस्टिग्मैटिज़्म

जब दोनों घुमाव एक-दूसरे से 90 डिग्री के कोण पर होते हैं, तो इसे रेग्युलर या नियमित एस्टिग्मैटिज़्म कहते हैं।

2. इर्रेग्युलर एस्टिग्मैटिज़्म

जब दोनों घुमाव, अनियमित होते हैं, यानी 90 डिग्री पर नहीं होते हैं तो यह एस्टिग्मैटिज़्म इर्रेग्युलर या अनियमित होता है।

इर्रेग्युलर एस्टिग्मैटिज़्म, किसी ट्रॉमा, सर्जरी या आंखों से संबंधित किसी समस्या के कारण हो सकता है, जिसे केरैटोकोनस कहते हैं, जहां कोर्निया धीरे-धीरे पतला होने लगता है।

कारण

एस्टिग्मैटिज़्म का स्पष्ट कारण तो पता नहीं है, लेकिन अनुवांशिकी इसका एक बहुत बड़ा कारण मानी जाती है।

यह अक्सर जन्म से ही मौजूद होता है, लेकिन यह जीवन में बाद में भी विकसित हो सकता है। इसका कारण आंखों में चोट लगना, बीमारी या सर्जरी हो सकता है।

यह अक्सर निकटदृष्टि दोष या दूर दृष्टि दोष के साथ होता है।

कम रोशनी में पढ़ने या नजदीक से टीवी देखने से एस्टिग्मैटिज़्म नहीं होता है।

अधिक खतरा किनको है ?

एस्टिग्मैटिज़्म, बच्चों और व्यस्कों में हो सकता है। एस्टिग्मैटिज़्म विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है, अगर आपको निम्न में से कोई एक समस्या हो:

  • एस्टिग्मैटिज़्म या आंखों से संबंधित दूसरी समस्याओं का पारिवारिक इतिहास, जैसे केरटोकोनस(कोर्निया का डिजनरेशन)।
  • कोर्निया क्षतिग्रस्त हो जाना या पतला हो जाना।
  • निकट दृष्टि दोष, जिससे दूर की दृष्टि अत्यधिक धुंधली हो जाती है।
  • दूर दृष्टिदोष, जिससे पास की चीजें स्पष्ट दिखाई नहीं देती हैं।
  • कुछ निश्चित प्रकार की आई सर्जरी, जैसे मोतियाबिंद सर्जरी (धुंधले लेंस को सर्जरी से निकालना)

लक्षण

एस्टिग्मैटिज़्म के लक्षण, अलग-अलग लोगों में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोगों में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। एस्टिग्मैटिज़्म, के लक्षणों में सम्मिलित हैं:

  • दूर या पास, दोनों स्थितियों में दृष्टि धुंधली, विकृत और अस्पष्ट हो जाना।
  • रात को देखने में परेशानी आना।
  • भैंगापन।
  • आंखों में जलन।
  • सिरदर्द।
  • आंखों में तनाव और खिंचाव; विशेषकर जब आंखों को काफी देर तक एक ही चीज पर केन्द्रित करना होता है, जैसे पढ़ने या कम्प्युटर पर काम करने के दौरान।

अगर आपमें, यह लक्षण दिखें तो डॉक्टर को दिखाएं। कुछ लक्षण दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं या दृष्टि संबंधी अन्य समस्याओं के कारण भी दिखाई दे सकते हैं।

डायग्नोसिस (मूल्यांकन)

एस्टिग्मैटिज़्म के लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देते हैं। अगर आपकी दृष्टि में परिवर्तन दिखे तो डॉक्टर के पास जाएं।

डॉक्टर विभिन्न जांचे कर के पता लगाएगा कि आपको एस्टिग्मैटिज़्म है या नहीं। इन जांचों में सम्मिलित हैं:

विजुअल एक्युटी टेस्ट (आंखो की नजर की जांच)

इसमें एक चार्ट पर लिखे, अक्षरों को पढ़ने के लिए कहा जाता है। यह अक्षर हर अगली लाइन के साथ धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं।

एस्टिग्मैटिक डायल

एस्टिग्मैटिक डायल एक चार्ट होता है, जिसमें रेखाओं की एक श्रृंखला होती है। जिन लोगों की दृष्टि ठीक होती है, उन्हें रेखाएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, लेकिन जिन्हें एस्टिग्मैटिज़्म होता है उन्हें रेखाएं स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती हैं।

फोरोप्टर

इसमें जांच के दौरान कई लेंस लगाए जाएंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आपको किस लेंस से सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।

ऑटोरिफ्रैक्टर

इस यंत्र के द्वारा आंखों पर प्रकाश डाला जाता है, यह देखने के लिए जब यह रिफ्रेक्ट या अपवर्तित होता है तो इसमें क्या परिवर्तन होता है। इससे आंखों के लिए सही लेंस चुनने में सहायता मिलती है।

करैटोमीटर या ऑप्थेलमोमीटर

यह यंत्र कोर्निया की सतह से अपवर्तित प्रकाश को मापता है। यह कोर्निया के कर्व या घुमाव का व्यास मापता है और इससे असामान्य घुमाव की डिग्री का पता लगाने में सहायता मिलती है।

उपचार

चश्मे या कांटेक्ट लेंस के द्वारा एस्टिग्मैटिज़्म के सभी मामलों को ठीक किया जा सकता है, गंभीर मामलों में ही सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

लेकिन अगर समस्या मामूली है और आपको आंखों से संबंधित कोई दूसरी कोई समस्या नहीं है तो आपको उपचार की जरूरत नहीं होती।

करेक्टिव लेंस आई ग्लासेस (चश्मा)

आई ग्लासेस या चश्मे में ऐसे लेंसों का इस्तेमाल किया जाता है, जो आंखों में प्रवेश करने वाले प्रकाश को ठीक तरह से अपवर्तित करे और ठीक तरह से देखने में सहायता करे।

टोरिक कांटेक्ट लेंस

एस्टिग्मैटिज़्म रोगियों को विशेष प्रकार के मुलायम कांटेक्ट लेंस लगाने की सलाह दी जाती है, जिन्हें टोरिक लेंसेस कहा जाता है। ये प्रकाश को सही दिशा में मोड़ते हैं।

आर्थोकेरैटोलॉजी (आर्थो-के)

एस्टिग्मैटिज़्म के गंभीर मामलों में रिज़िड (सख्त/कड़े) लेंस लगाने को कहा जाता है, इन्हें रात को सोते समय लगाना होता है, और ये कोर्निया को पुनः सही आकार देते हैं।

इस नए आकार को बनाए रखने के लिए इन लेंसों को लगातार पहनना होता है, लेकिन आपको रोज-रोज इन्हें पहनने की जरूरत नहीं पड़ती है। इस तकनीक को आर्थोकेरैटोलॉजी कहते हैं, लेकिन यह तकनीक स्थायी रूप से दृष्टि को ठीक नहीं करती है।

अगर इन्हें पहनना बंद कर दिया जाता है तो यह समस्या वापस वैसी ही हो जाती है।

रिफ्रेक्टिव सर्जरी (चश्मा उतारने की सर्जरी)

कोर्निया का आकार बदलने के लिए रिफ्रेक्टिव सर्जरियां भी की जाती हैं। इन रिफ्रेक्टिव सर्जरियों में लेसिक, पीआरके और सबसे आधुनिक तकनीक (कोंटयूरा विजन) सम्मिलित है। इसके लिए आंखें स्वस्थ्य होना चाहिए, रेटिना से संबंधित कोई समस्या नहीं होना चाहिए या कोर्निया पर कोई घाव के निशान नहीं होना चाहिए।

रिफ्रेक्टिव सर्जरी दृष्टि को सुधारती है और चश्मे या कांटेक्ट लेंसों की आवश्यकता को कम करती है। इसमें लेज़र बीम का इस्तेमाल किया जाता है।

कोंटयूरा विजन सर्जरी, एस्टिग्मैटिज़्म के उपचार के लिए सबसे सफल रिफ्रेक्टिव सर्जरी है ।

कब कराएं आंखों की जांच?

  • 6 महीने की उम्र में।
  • 3 साल की उम्र में।
  • 6 साल की उम्र में।

इसके बाद हर दो साल में। जिन बच्चों को आंखों से संबंधित समस्याओं का खतरा अधिक है, उन्हें हर साल जांच करानी चाहिए।

व्यस्कों को हर दो साल में अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए, लेकिन अगर उन्हें डायबिटीज है तो हर वर्ष या छह महीने में कराएं।

बच्चों में एस्टिग्मैटिज़्म

कई बच्चे एस्टिग्मैटिज़्म के साथ जन्म लेते हैं, और अक्सर उनके एक साल के होने तक यह समस्या अपने आप ठीक हो जाती है।

बच्चे अपनी समस्याओं के बारे में नहीं बता पाते, इसलिए छह महीने की उम्र में ही उनकी आंखों की जांच करा लेनी चाहिए।

अगर डायग्नोसिस कराकर उपचार न कराया जाए तो न केवल उनकी आंखों की समस्या गंभीर हो जाएगी बल्कि उन्हें सीखने भी समस्या आएगी जिससे वो लर्निंग डिसआर्डर के शिकार हो सकते हैं।